प्रकृति पुजक थारु ओ अष्टिम्की

सुधराम दहित/भदौं २०,
कृष्ण जन्माष्टमी अर्थात थारु समुदायमे मनाजिना अष्टिम्की । अष्टिम्कीसे थारु हुक्रे बास्तविक प्रकृति पुजारी होई कना प्रमाणित हुईठ । संसारके सृष्टी सृजनासे लैके मानव सभ्यतासम जोरल यि पर्वमे थारु हुक्रे अष्टिम्की चित्र बनाके पुजाआजा कर्ठैं ।
अष्टिम्कीमे कृष्ण, पाँच पाण्डव, छठी नारायण, सातो सखि, १२ मुरी, कजरिक बन्वा, डुल्हा–डुल्ही, साँप–गिजोर, हाथी–घोरा, रोहली मछरिया, लवलीया, गोहुवा, डुधिया केच्ना, खेचुहिया, सेठ्ली कुकनिया लगायत दिन ओ जोन्ह्याँ के सँगे धेउर चिजके चित्रमे पुजा कैजाईठ ।
कृष्ण जन्माष्टमीके आघेक रोज रातके विशेष कैके थारु परिकार ओ मच्छी टिना सँगे डर खा जाईठ । दोसरदिन वर्त बैठुईया हुक्रे विहानसे १२ बजे सम्म विना पानी पिले वर्त रठैं । १२ बजे पाछे लाहाखोरके पुजा पाठ कैके, धुप बत्ती बारके, अंठामे सर्रि धुपाके पुजा कर्ठै ओ जल पिठैं । ओकर पाछे दिनभर भुख्ले रहिके बर्त बट्ठै ।
साँझके दिनबुरल पाछे गाउँके एक घरमे बनागिल अष्टिम्की चित्रमे सक्कु जाने सामुहिक रुपसे आपन आपन घरसे डिउटनके कोठामे दिया बारके टठियामे चाउर, फुला, खिरा, लरंगी, केरा, अम्रुट, कुन्ह्रु, सुपारी के भेरुवा बनाके सिन्दुरसे आपन डेउटन टिकके छाँकी बुँदा डैके डिउलीमे डिया बारके अष्टिम्की टिके जैठै ।

वहाँ सक्कु जाने अष्टिम्की चित्र मे टिक्ठै ओ पुजा तथा अन्नाबालीके प्रतिनिधित्व करल कुश, मकै, धान ओ गन्नाकबोटमे फे टिक्ठैं । पँहटि पहाँटके चाउर ओ भेरुवा धर्थै ओ दिया बर्थै । सक्कु ठनके आईल भेरुवाके चोंटी काटके दियाके दायाँबाँया ढर्देथै । ओ भेरुवाके रुपमे आईल केरा, खिरा, लरंगी, अम्रुटहे प्रसादके रुपमे बाँट जाईठ ।
अस्टिम्की टिकके आके घरे फे धुपबत्ति बारके पुजाआजा कैके फलफुल, दहि, सरवत से बर्तालु हुक्रे भोजन कर्ठै ।
अष्टिम्की टिक्ना ठाउँमे गित गउयिया हुक्रे रातके १२ बजे सम अष्टिम्कीहा गित गैठैं । रातके बारा बजे भगवान कृष्णके जन्म हुईठ ओकर पाछे फे गितेहे सक्कु जाने सवर्थैं, भजनकृष्तन कर्थै ओ रमैठै । वहेरातसे अर्थात अष्टिम्कीक रोजसे थारु साँस्कृतिक नाचके सुरुवात कर्ना फे चलन बा ओ वहे रातसे जार -चिसो) के सुरुवात हुईल पुखौली कहावट बा ।

विहानके वर्त रहुईया सक्कु जाने आपन आपन घरसे सखुवक पत्ताके टेपरीमे दियाकलग बाटी ओ तेल लैके अईठै ओ फेरसे अष्टिम्कीमे टिक्ठै ओ आपन आपन डिउली दिया उठैठैं । ओ सक्कुजाने लाईन लागके लग्गेक कुलुवा, झरनहियाँ, लडियामे अष्टिम्की अस्राई जैठैं । वहाँ अष्टिम्की अस्राईबेर आपन घर परिवारमे अईना दुःख, स्वास्थ्यमे अईना समस्या सक्कु यिहे सँगे लैजाउ ओ घरमे सुख शान्ती, आत्मीयता, अमनचयन, अनधन बर्हे कना माँङ कर्ना फे चलन बा ।
ओकर पाछे घरे आके दालभात, मछिक खेरीया-पटोस्नी), आलुगोभी, पोईकसाग, केराउके तरकारी लगायतके कम्तीमे ५ प्रकारके टिना भात अग्रासनके लग परोस जाईठ ओ भात खैना सुरु कैजार्ईठ ।
उहे परोसल भात अर्थात खाना, फलफुल ओ आपन क्षमता अनुसारके चाउर ओ पैसा फे आपन आपन दिदि बहिनिया, आफन्त हुक्रनहे अग्रासनके रुपमे दैजिना चलन परापुर्वकालसे चल्टि आईलबा । विशेष कर्के लाव भोजही हुक्रे अष्टिम्की ओ अँटवारीमे आपन लैहेरसे अग्रासनके आस लग्ना चलन फे बा । यिदिनहे आपन दादा बहिनिया अथवा आफन्त हुक्रनके भेट हुईना मजा अवसरके रुपमे फे लैजाईठ । उ दिन दिदि बहिनियाँ आपन भैया बहिनिया ओ आपन्त हुक्रनहे मिठमिठ खैनापिना खवैठै ओ साँझके विदा कर्थैं । अग्रासन डेहे जवैया नाँटपाँट वहाँ रात रहे नै पैना फे चलन बा ।

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